राजेंद्र सिंह: 'जल पुरुष' जिन्होंने बंजर धरती पर उगाया 'खुशहाली का प्रकाश' || Gyan Se Prakash ज्ञान से प्रकाश - एक शिक्षित समाज की ओर अग्रसर
राजेंद्र सिंह: 'जल पुरुष' जिन्होंने बंजर धरती पर उगाया 'खुशहाली का प्रकाश'
आधुनिक भारत में ग्रामीण विकास और वंचितों के उत्थान की बात तब तक अधूरी है जब तक हम राजेंद्र सिंह (Rajendra Singh) के योगदान की चर्चा न करें। उन्होंने राजस्थान के सूखे और बंजर इलाकों में जल क्रांति लाकर हज़ारों परिवारों को पलायन और गरीबी के चंगुल से मुक्त कराया।
1. एक कठिन शुरुआत और वैचारिक परिवर्तन
राजेंद्र सिंह पेशे से एक सरकारी आयुर्वेद डॉक्टर थे। जब वे 1985 में राजस्थान के अलवर जिले के एक छोटे से गाँव 'भीखमपुरा' पहुँचे, तो उनका उद्देश्य केवल लोगों का इलाज करना था।
असली समस्या का बोध: उन्होंने देखा कि वहाँ के लोग बीमार कम और प्यासे ज़्यादा थे। पानी की कमी के कारण फसलें नहीं हो रही थीं, युवा गाँव छोड़कर शहरों में मजदूरी के लिए भाग रहे थे, और महिलाएँ मीलों पैदल चलकर पानी लाती थीं।
बुजुर्गों की सीख: एक बुजुर्ग ग्रामीण ने उनसे कहा, "हमें दवा नहीं, पानी चाहिए। पानी होगा तो हम खुद अपना ख्याल रख लेंगे।" इस एक वाक्य ने राजेंद्र सिंह का जीवन बदल दिया। उन्होंने स्टेथोस्कोप छोड़कर फावड़ा उठा लिया।
2. 'जोहड़' और सामुदायिक योगदान
राजेंद्र सिंह ने पारंपरिक भारतीय जल संरक्षण पद्धति 'जोहड़' (मिट्टी के चेक डैम) को पुनर्जीवित किया।
सामुदायिक शक्ति: उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के ग्रामीणों को संगठित किया। उनका मानना था कि समाज जब तक खुद अपनी समस्याओं के समाधान में नहीं जुड़ेगा, तब तक "एक शिक्षित और आत्मनिर्भर समाज" का सपना पूरा नहीं होगा।
चमत्कारिक परिणाम: पिछले तीन दशकों में उन्होंने और उनकी संस्था 'तरुण भारत संघ' ने करीब 11,000 से ज्यादा जोहड़ बनवाए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि जो नदियाँ सूख चुकी थीं (जैसे अरवरी नदी), वे फिर से 12 महीने बहने लगीं।
3. समाज पर प्रभाव: गरीबी से समृद्धि की ओर
राजेंद्र सिंह के जल संरक्षण अभियान का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा:
रिवर्स माइग्रेशन: पानी आने के बाद खेती फिर से शुरू हुई और जो युवा शहरों की झुग्गियों में नारकीय जीवन जी रहे थे, वे अपने गाँव लौट आए।
शिक्षा में सुधार: जब पानी के लिए मीलों चलना बंद हुआ, तो ग्रामीण बच्चों, विशेषकर लड़कियों को स्कूल जाने का समय मिला। शिक्षा का स्तर सुधरा।
आर्थिक आजादी: पशुपालन और कृषि के विस्तार से वंचित समुदायों की आय में जबरदस्त वृद्धि हुई।
4. निष्कर्ष
राजेंद्र सिंह, जिन्हें 'स्टॉकहोम वॉटर प्राइज' (जल का नोबेल) से सम्मानित किया गया है, हमें सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर ही हम गरीबी जैसी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। वे 'ज्ञान से प्रकाश' के उस दर्शन को चरितार्थ करते हैं जहाँ पारंपरिक ज्ञान का सही उपयोग आधुनिक समस्याओं का समाधान बनता है।
आज का विचार: > "धरती की प्यास बुझाना, इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा है।"
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