the power of positivity || जियो और जीने दो: केवल नारा नहीं, सुखी जीवन का आधार ! 🌿 || Gyan Se Prakash ज्ञान से प्रकाश - एक शिक्षित समाज की ओर अग्रसर

 


जियो और जीने दो: केवल नारा नहीं, सुखी जीवन का आधार! 🌿

आज के आधुनिक युग में हम चाँद पर पहुँच गए हैं, समुद्र की गहराइयाँ नाप चुके हैं, लेकिन क्या हम इंसानियत के सबसे बुनियादी नियम को भूलते जा रहे हैं? भगवान महावीर का वह कालजयी उद्घोष— 'जियो और जीने दो' — आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

1. हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं (Interdependence)

सृष्टि का नियम है कि कोई भी जीव अकेला पूर्ण नहीं है। एक नन्हा सा पौधा हो या विशाल हाथी, हम सब एक अदृश्य धागे से बंधे हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है:

'जीवो जीवस्य जीवनम्' अर्थात, एक जीव ही दूसरे जीव के जीवन का आधार है। जब हम पर्यावरण या किसी अन्य जीव को नुकसान पहुँचाते हैं, तो अनजाने में हम खुद के विनाश की नींव रख रहे होते हैं।

2. स्वार्थ की पट्टी और प्रकृति का संकट ⚠️

इंसान ने अपनी सुख-सुविधा और मनोरंजन के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया है। जहाँ वन्य जीव केवल पेट भरने के लिए शिकार करते हैं, वहीं मनुष्य ने 'स्वार्थ' के लिए हिंसा को अपना लिया है। आज जलवायु परिवर्तन और गहराता पर्यावरणीय संकट हमारी इसी 'विकृत सोच' का परिणाम है।

3. 'अहिंसा परमो धर्म:' – हमारी असली संस्कृति

हमारी वैदिक संस्कृति ने हमेशा सुरक्षा और शांति का संदेश दिया है।

  • अभयं न: पशुभ्य: – यानी पशुओं को भी अभय दान मिले।

  • जीवेम शरद: शतम् – सभी के 100 वर्षों तक स्वस्थ जीने की कामना।

वैदिक मंत्र 'सर्वे भवंतु सुखिन:' हमें सिखाता है कि हमारी खुशी तभी सुरक्षित है जब हमारे आस-पास के सभी जीव सुखी और सुरक्षित हों।

4. समाधान: सह-अस्तित्व (Co-existence)

वैश्विक संघर्ष, युद्ध और नफरत का एकमात्र इलाज इस दर्शन में छिपा है। यदि हम दूसरों की संप्रभुता, उनके जीने के अधिकार और उनके सम्मान की रक्षा करेंगे, तो दुनिया से हिंसा अपने आप मिट जाएगी।


निष्कर्ष: ज्ञान से प्रकाश की ओर 🕯️

एक 'शिक्षित समाज' वही है जो केवल साक्षर न हो, बल्कि संवेदनशील भी हो। 'जियो और जीने दो' का अर्थ है— अपनी प्रगति के साथ-साथ दूसरों के मार्ग में बाधा न बनना। आइए, आज हम संकल्प लें कि हम प्रकृति और जीव-जगत के प्रति दयालु बनेंगे।

क्योंकि जब सब जियेंगे, तभी मानवता बचेगी।


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