06-04-2026 || क्या बाहरी दिखावा ही भक्ति है ? तुलसीदास जी का यह दोहा आज के युवाओं के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है ! || Gyan Se Prakash ज्ञान से प्रकाश - एक शिक्षित समाज की ओर अग्रसर
क्या बाहरी दिखावा ही भक्ति है? तुलसीदास जी का यह दोहा आज के युवाओं के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है! आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर शांति की तलाश में बाहरी रास्तों को अपनाते हैं। कोई घर छोड़ देता है, कोई वेशभूषा बदल लेता है, तो कोई केवल सोशल मीडिया पर 'आध्यात्मिक' दिखने की कोशिश करता है। लेकिन क्या वास्तव में शांति और ईश्वर का मार्ग यही है? ज्ञान से प्रकाश (एक शिक्षित समाज की ओर अग्रसर) के आज के अंक में हम गोस्वामी तुलसीदास जी के एक अत्यंत गहरे दोहे पर चर्चा करेंगे, जो ६ अप्रैल की विशेष सीख है। तुलसीदास जी की अमर वाणी तुलसी जौं पै रामसों नाहिंन सहज सनेह। मूँड़ मुड़ायो बादिही भाँड भयो तजि गेह ॥ भावार्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि भगवान से (या अपने लक्ष्य से) आपका स्वाभाविक और सच्चा प्रेम नहीं है, तो सिर मुड़ाकर साधु बन जाना या घर-बार त्याग देना बिल्कुल व्यर्थ है। ऐसा व्यक्ति केवल एक 'भाँड' (बहरूपिया) के समान है जो केवल वेश बदलकर लोगों को ठगता है या स्वयं को धोखे में रखता है। आज के युवा को क्या सीखना चाहिए? (Key Lessons for Today's Youth) आज की युवा पीढ़ी ...
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